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- भगवान की परिक्रमा करें तो ये बातें जरूर ध्यान रखें...
पूजा-अर्चना आदि के बाद भगवान की मूर्ति के आसपास सकारात्मक ऊर्जा एकत्रित हो जाती है, इस ऊर्जा को ग्रहण करने के लिए परिक्रमा की जाती है। परिक्रमा शुरु करने के पश्चात बीच में रुकना नहीं चाहिए। साथ परिक्रमा वहीं खत्म करें जहां से शुरु की गई थी। ध्यान रखें कि परिक्रमा बीच में रोकने से वह पूर्ण नही मानी जाती। परिक्रमा के दौरान किसी से बातचीत कतई ना करें। जिस देवता की परिक्रमा कर रहे हैं, उनका ही ध्यान करें। इस प्रकार परिक्रमा करने से पूर्ण लाभ की प्राप्ती होती है।
किस देवी-देवता की कितनी परिक्रमा:
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- शिवजी की आधी परिक्रमा की जाती है।
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- देवी मां की तीन परिक्रमा की जानी चाहिए।
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- भगवान विष्णुजी एवं उनके सभी अवतारों की चार परिक्रमा करनी चाहिए।
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- श्रीगणेशजी और हनुमानजी की तीन परिक्रमा करने का विधान है।
- संदेश
परम पूज्य महाराजश्री कहते है आलोचक सदैव सम्मानित होते है क्योकि यह आपको वास्तविकता से परिचत कराते है लेकिन इसके लिए जरूरी यह है की आलोचना ईमानदारी और पूर्वाग्रह से ग्रस्त न हो ....जीवन में उन्नति के लिए समर्थको के साथ साथ विरोधियो की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है ! विरोधी ही आपको आपके लक्ष्य प्राप्ति के प्रति गंभीर बनाते है ! ठीक उसी प्रकार जैसे शक्कर के बिना जीवन संभव है किन्तु नमक के बिना स्वादहीन ! जीवन में नमक के महत्त्व को पहचानिए और विरोधियो का सम्मान करे वे पथप्रदर्शक की भूमिका में है..इसीलिए गुरुतुल्य भी है .....आपका दिन मंगलमय हो
- श्री रामकृष्ण परमहंस (ठाकुर) एवं स्वामी विवेकानंद (नरेन्द्र) जी का संवाद
ठाकुर अपने कमरे में अकेले बैठ कर हलके-२ कोई गीत गुनगुना रहे थे! नरेन्द्र ने आकर उनके चरण पकड़ लिए....
ठाकुर ने उसकी ओर देखा "क्या है रे! आज यह सब क्या हो रहा है?
"आपने कहा था कि अपनी माँ और भाइयो के पालन का दायित्व मुझे सौपा गया है!"
"हाँ ! कहा तो था! यदि मां की इच्छा न होती,तो तेरे पीता का देहांत क्यों होता?"
"अपने दायित्व को पूर्ण करने में मै सर्वदा असमर्थ रहा हू!"
"तो?"
"जिसका दायित्व है ,उसे ही लौटा रहा हूँ !"
"तो मेरे पाँव क्यों पकडे हुए है?"
"आप जगदम्बा से कहें कि वह अपना काम अपने हाथ से करे! मुझे इस दायित्व से मुक्त करे!"
"क्या हो गया है, आज? तेरा पौरुष इतना दीन क्यों हो रहा है?"
"क्योकि अपने पौरुष का भ्रम मिट गया है! मेरे माँ एवं भाइयो का कष्ट दूर करने के लिए, आपको जगदंबा से प्रार्थना करनी होगी!"
ठाकुर छिटक कर अलग खड़े हो गए,"मै ऐसी सांसारिक बाते माँ से नहीं करता ! उसकी माया है,वह स्वयं चलाये'जैसे उसका मन चाहे! मै टांग आड़ाने वाला कौन हू?"
नरेन्द्र हठपूर्वक बोला, " जब संसार उसका है ,तो सांसारिक बाते भी तो उसी से कही जाएगी!"
"तू कहा मानता है कि संसार उसका है!मानता है,क्या? माँ को तू नहीं मानता! इसी लिए कष्ट है!"
"यह सत्य नहीं है कि माँ को मानता नहीं!सत्य ये है कि मै माँ को जानता नहीं!"
"तो फिर तू उससे क्यों कहलवाना चाहता है,जिसे तू जानता ही नहीं! उससे ही क्यों नहीं कहता,जिसे तू जानता है!"
नरेन्द्र की आँखे गीली हो गई,""उसी से तो कह रहा हू! मै तो केवल आपको ही जानता हूँ! आप माँ को जानते है तो मेरे लिए आपही उनसे कहिये!"
"अरे मैंने तो कितनी ही बार कहा है! माँ,नरेन्द्र का दुःख कष्ट दूर कर दो! पर तू माँ को मानता नहीं ,इसलिए माँ सुनती ही नहीं!"
"आप फिर कहिये!मेरी ओर से कहिये! जब तक न माने,तब तक कहिये! नहीं तो मै आपके चरण नहीं छोड़ूगा!"
"तू तो बहुत हठी है रे! अच्छा!तू स्वयं माँ से कह,तू माँ को नहीं जानता तो जान-पहचान कर!"
नरेन्द्र को लगा,ठाकुर ठीक ही कह रहे है!वह व्यर्थ ही हठ कर रहा है!जान-पहचान करने से ही तो परिचय होगा!"
"अपना मार्ग स्वयं अपने पैरो से चलाना होता है,रे! किसी के कंधे पैर चढ़ कर कितनी यात्रा हो सकती है?"
"माँ मेरी बात सुनेगी?"
"क्यों नहीं सुनेगी?जगदम्बा हैं वे!सबकी माँ! पुत्र की प्रार्थना पैर ध्यान नहीं देगी,क्या?"
नरेन्द्र आत्मलीन सा सोचता रह गया!क्या कहें वह?
क्रमशः
- संत वाणी...........................
पिछले 24 घण्टे मुझे अपने गुरु का भावपूर्ण सानिध्य प्राप्त हुआ।
उनके आर्शीवचनो मे से एक बेहद महत्वपूर्ण बात उन्होने किसी से
“ आर्शीवाद ” माँगते हुये कही.............आप सब कर्म करे.......
हमारे पास देने को आर्शीवाद नही है........अगले ही शब्दो मे उन्होने कहा
......आप आर्शीवाद का अर्थ समझते है??? हमारा आर्शीवाद उनके साथ है
जो धैर्य और समर्पण भाव रखते है। उन्होने कहा...... आर्शीवाद
ठीक वैसा ही है जैसे दूध से घी निकालना।
- पहले दूध को गर्म किया जाता है फिर ठण्डा....
.उसमे खटाई डाली जाती है और दही जमने तक
इंतजार किया जाता है......फिर उस जमे दही को
मथना पडता है ताकि उससे नेनू निकल सके......
जिसकी परीक्षा पुनः अग्नि करती है.....
यानि उसे गर्म किया जाता है तब जा कर घी निकलता है।
.....लेकिन वो भी तुरन्त ग्रहण करने योग्य नही होता...।
उसे छानना पडता है....अशुद्धि दूर कर उपयोग लायक बनाना होता है।
......ठीक ऐसे ही आर्शीवाद की महत्ता है।
सब माँगते तो आर्शीवाद है
लेकिन कोई भी इस पूरी प्रक्रिया से होकर गुजरना नही चाहता.........
जय गुरूदेव...........
- Message:
The most important thing in satsang is you. Not the usual egoic sense of yourself, but the mysterious awakeness that is reading these words. That is what satsang is all about. The purpose of gathering is not to provide devotion to the spiritual teacher or to acquire spiritual knowledge or to enjoy the company of others. The purpose of gathering in satsang is to bring you home to yourself........
- जिसके जीवन में जितने दुख होते हैं, वह उतना ही सबल होकर सुख की यात्रा पर निकलता है। क्योंकि दुख विपरीत स्थितियों से जूझने की क्षमता का विकास कर हमारी ऊर्जा को जगाता है।
(जय श्री रावतपुरा सरकार)
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Shri Rawatpura Sarkar
The name Shri Rawatpura Sarkar has emerged from the ancient temple of Hanuman Ji which is situated in Rawatpura village of the Chambal region in Madhya Pradesh, India.
It is situated between Pahuj and Sonmriga rivers and is at a distance of 100 kms from two major cities; Gwalior and Jhansi.
During the period from 1960 to 1985, Chambal has been notorious throughout India for its criminal activities which mushroomed because of lack of education,
sources of income and arable land.
In 1990 a great divine saint set foot on this place at a very young age of 17 with a pledge to start a mission that would transform the social
fabric of this region as well as to spread the message of
spiritual living among the masses. Even though this saint was very young to undertake
a mission of such enormity, yet anyone who came to him was touched by his divinity and
compassion and he firmly established his place in their hearts. Soon after, the place is
popularly known as Shri Rawatpura Sarkar Dham.
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